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1 Tampilan · 23 hari yang lalu

फणीश्व.रनाथ रेणु ने अपनी चर्चित कहानी लाल पान की बेगम से स्त्री सशक्तिकरण की मिसाल पेश की थी। इस कहानी से उन्होंने बताया था कि स्त्रियों भी अपनी जिंदगी को अपनी शर्तो पर जीना चाहती है। वह आत्मसम्मान चाहती है पर्दे की प्रथा हो या ऐसी कोई भी कुप्रथा जो उन्हें गुलामों सा जीवन जीने पर मजबूर करती हो वह अब उन्हें स्वीकार्य नहीं है।

उनकी इस कहानी पर आधारित नाटक लाल पान की बेगम का मंचन रविवार की शाम कालिदास रंगालय में किया गया।

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0 Tampilan · 23 hari yang lalu

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" (7 मार्च, 1911 - 4 अप्रैल, 1987) को कवि, शैलीकार, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार, ललित-निबन्धकार, सम्पादक और अध्यापक के रूप में जाना जाता है।[1] इनका जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कसया, पुरातत्व-खुदाई शिविर में हुआ।[2] बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहारऔर मद्रास में बीता। बी.एससी. करके अंग्रेजी में एम.ए. करते समय क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़कर बम बनाते हुए पकड़े गये और वहाँ से फरार भी हो गए। सन्1930 ई. के अन्त में पकड़ लिये गये। अज्ञेय प्रयोगवाद एवं नई कविताको साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं। अनेकजापानी हाइकु कविताओं को अज्ञेय ने अनूदित किया। बहुआयामी व्यक्तित्व के एकान्तमुखी प्रखर कवि होने के साथ-साथ वे एक अच्छे फोटोग्राफर और सत्यान्वेषी पर्यटक भी थे।

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0 Tampilan · 23 hari yang lalu

हिंदी कहानी के इतिहास में उसने कहा था के बाद शेखर जोशी विरचित कोसी का घटवार अपनी तरह की अलग और विशेष प्रेमकहानी है।


फौजी जवान गुंसाई और लछमा की कहानी, जहां सांसारिक अर्थ में प्रेम परास्त होता है। बड़े-बूढ़ों की जिद लछमा का विवाह कहीं और करवा देती है, क्योंकि गुंसाई अनाथ है और फौज में उसकी जान का भी भरोसा नहीं।1कहानी बताती है कि लछमा का पति रामसिंह भी फौज में है पर उसके पीछे भरापूरा परिवार है।


यह मनोविज्ञान कि अकेले आदमी को ब्याह कर बेटी संकट में पड़ सकती है और उधर दूसरे आदमी पर संकट आया भी तो परिवार देखभाल के लिए है, खोखला निकलता है। रामसिंह नहीं रहता और क्योंकि मनोविज्ञान जटिल विषयवस्तु है, रामसिंह के जेठ-जिठानी वाले परिवार का भी एक मनोविज्ञान है, जो विधवा लछमा और बच्चे को खुद पर बोझ और ज़मीन-जायदाद पर अवांछित अधिकारी मानता है।

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1 Tampilan · 23 hari yang lalu

अमृतसर आ गया है", भीष्म साहनी द्वारा लिखित एक कहानी है।यह किताब भारत के विभाजन के परिदृश्य पर लिखी गई है। कहानी में शरणार्थियों के एक समूह का पाकिस्तान से भारत के सीमावर्ती शहर अमृतसर की ओर यात्रा के दौरान के भयावहता और विनाश का वर्णन हैं।साहनी ने विभाजन के विषय पर अपना महाकाव्य उपन्यासतमस (1973) भी लिखा था, जिस पर गोविंद निहलानी ने एक टीवी फिल्म बनाया था।

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1 Tampilan · 23 hari yang lalu

चीफ की दावत ’ भीष्म साहनी द्वारा रचित प्रमुख कहानी है। इस कहानी में उन्होने मध्यमवर्गीय समाज के खोखलेपन तथा दिखावटीपन को दर्शाया है। उनके द्वारा रचित कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। जितनी उस समय थी। भीष्म साहनी ने शामनाथ के माध्यम से शिक्षित युवा पीढ़ी पर करारा व्यंग्य किया है। आज के शिक्षित युवा वर्ग अपने माता पिता को बोझ समझते हैं। व्यक्ति अपनी सुख सुविधा के लिए अपने माता पिता को छोड़ देते हैं। वे यह तक भूल जाते हैं कि आज जिस समाज मे तुम रह रहे हो उनकी बदौलत है। अपने बच्चो को काबिल बनाने के लिए माता पिता अपना सर्वस्व समर्पित कर देते हैं। उनका पूरा जीवन अपने बच्चों की खुशी के लिए बलिदान में व्यतीत हो जाता है। ‘ चीफ की दावत ’ एक ऐसी ही कहानी है , जिसमें स्वार्थी बेटे शामनाथ को अपनी विधवा बूढ़ी माँ का बलिदान फर्ज ही नजर आता है।

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4 Tampilan · 23 hari yang lalu

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर कृष्णा सोबती अपने संयमित अभिव्यक्ति और सुथरी रचनात्मकता के लिए मशहूर हैं। कविता में गद्य के क्षेत्र में पदार्पण करने वाली हिंदी की प्रख्यात कथाकार कृष्णा सोबती का लेखन आज भी काव्य की कोमलता एवं माधुर्य से ओतप्रोत है। हिंदी कथा साहित्य को नए रचनात्मक आयाम देती भाषा शैली उनके पास है। नारी के अंतर्मन को पहचानने की कला में निपुण हैं। उनकी कहानियाँ कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टियों से उनके रचनात्मक वैविध्य को रेखांकित करती हैं। आज के बदलते परिवेश में भी इनकी कहानियों की प्रासंगिकता बनी हुई है।

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4 Tampilan · 23 hari yang lalu

हरिशंकर परसाई (२२ अगस्त, १९२४ - १० अगस्त, १९९५) हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और व्यंगकार थे। उनका जन्म जमानी, होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के–फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने–सामने खड़ा करती है, जिनसे किसी भी व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग असंभव है। लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। सामाजिक पाखंड और रूढ़िवादी जीवन–मूल्यों के अलावा जीवन पर्यन्त विस्ल्लीयो पर भी अपनी अलग कोटिवार पहचान है। उड़ाते हुए उन्होंने सदैव विवेक और विज्ञान–सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा–शैली में खास किस्म का अपनापा है, जिससे पाठक यह महसूस करता है कि लेखक उसके सामने ही बैठा है।ठिठुरता हुआ गणतंत्र की रचना हरिशंकर परसाई ने किया जो एक व्यंग है

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2 Tampilan · 26 hari yang lalu

ज्ञानरंजन अपनी कहानी ‘पिता’ में पिता-पुत्र संबंधों के यथार्थ को अपनी पूर्ववर्ती कहानियों की तुलना में काफी अलग ढंग से प्रस्तुत करते हैं। पुत्र उमस भरी गर्म रात में घर लौटा, उसने आध पल को बिस्तर का अंदाजा लेने के लिए बिजली जलाई। बिस्तर फर्श पर ही पड़े थे। पत्नी ने सिर्फ इतना कहा कि ‘आ गये’ और बच्चे की तरफ करवट लेकर चुप हो गयी।

वातावरण बहुत गर्म है। गर्मी की वजह से कपड़े पसीने में पूरी तरह से भीग चुके हैं। घर में सभी लोग सो चुके है घर के भीतर सिर्फ वही जागा है। घर में अगर पुत्र जागा है तो बाहर पिता भी जागे हुए हैं। रोती बिल्ली को देख पिता सचेत हो गये और उन्होंने डंडे की आवाज़ से बिल्ली को भगा दिया। जब वह घूम फिर कर लौट रहा था तब भी उसने कनखी से पिता को गंजी से अपनी पीठ खुजाते देखा था। लेकिन वह पिता से बचकर घर में घुस गया। पहले उसे लगा कि पिता को गर्मी की वजह से शायद नींद नहीं आ रही लेकिन फिर एकाएक उसका मन रोष से भर गया क्योंकि घर के सभी लोग पिता से पंखे के नीचे सोने के लिये कहा करते हैं लेकिन पिता हैं कि सुनते ही नहीं।

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1 Tampilan · 26 hari yang lalu

फणीश्वर नाथ 'रेणु' (4 मार्च 1921-11 अप्रैल 1977) हिन्दी भाषा के साहित्यकार थे। उनके पहले उपन्यास मैला आंचल लिए उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनका जन्म बिहार के अररिया जिले में फॉरबिसगंज के पास औराही हिंगना गाँव में हुआ था। उनकी शिक्षा भारत और नेपाल में हुई। इन्टरमीडिएट के बाद वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। बाद में 1950 में उन्होने नेपाली क्रांतिकारी आन्दोलन में भी हिस्सा लिया । उनकी लेखन-शैली वर्णणात्मक थी । पात्रों का चरित्र-निर्माण काफी तेजी से होता था ।उनका लेखन प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवादी परंपरा को आगे बढाता है । उनकी साहित्यिक कृतियाँ हैं; उपन्यास: मैला आंचल, परती परिकथा, जूलूस, दीर्घतपा, कितने चौराहे, पलटू बाबू रोड; कथा-संग्रह: एक आदिम रात्रि की महक, ठुमरी, अग्निखोर, अच्छे आदमी; रिपोर्ताज: ऋणजल-धनजल, नेपाली क्रांतिकथा, वनतुलसी की गंध, श्रुत अश्रुत पूर्वे । तीसरी कसम पर इसी नाम से प्रसिद्ध फिल्म बनी ।

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3 Tampilan · 27 hari yang lalu

राजा निरबंसिया कमलेश्वर जी की बहुचर्चित कहानी है। अपनी विषमता और विराटता में यह कहानी जीवन के विविध पक्षों का परामर्श कर यथार्थ अभिव्यक्ति करती है। यह कहानी आधुनिक भाव बोध कराने में पूरी तरह समर्थ है। इस कहानी का प्रकाशन फ़रवरी १९५७ में हुआ था। इस कहानी में लेखक ने परिवेश और वातावरण में आधुनिक मूल्यों की खोज की है। यह कहानी दृष्टि की अपेक्षा रूप में परिवर्तन का उदाहरण है। राजा निरबंसिया कहानी में दोहरी कथा चलती है। एक तरफ माँ द्वारा सुनी हुई कहानी राजा रानी की कथा हैं वहीँ दूसरी तरफ चंदा की अंतर्कथा। इसमें जीवन टुकड़ों में उभर कर सामने आती है और पात्र जीवन के अजनबीपन के शिकार बने रहते है।

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3 Tampilan · 27 hari yang lalu

परिंदे’ निर्मल वर्मा की सर्वाधिक चर्चित कहानियों में से है . यह न सिर्फ अपनी चित्रात्मक भाषा के ज़रिये एक नए शिल्प प्रयोग को सामने लाती है , बल्कि कथ्य के स्तर पर भी कई परंपरागत प्रतिमानों को तोड़ती हुई नज़र आती है . परिंदे एक प्रेम कथा है . ऐसा नहीं है कि हिंदी में प्रेम कथाएं कम लिखी गयी हैं . हिंदी कथा लेखन के आरंभिक चरण में ही ‘उसने कहा था ‘ ( चंद्रधर शर्मा गुलेरी) , पुरस्कार (जयशंकर प्रसाद) और जाह्नवी (जैनेन्द्र) जैसी शानदार प्रेम कथाएं सामने दिखती हैं , परन्तु ‘परिंदे’ अपनी पूर्ववर्ती प्रेमकथाओं से बिल्कुल अलग ज़मीन पर रची गयी है. यहाँ एक ओर जहाँ खोये हुए प्रेम की तड़प है तो दूसरी ओर उस प्रेम से मुक्त होने की छटपटाहट भी .

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3 Tampilan · 28 hari yang lalu

आज हिन्दी साहित्यकार जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी 1890 - 15 नवंबर 1937) की पुण्यतिथि है। जयशंकर प्रसाद छायावादी युग के चार प्रमुख स्तम्भों में एक थे। प्रसाद कविता के अलावा उपन्यास, कहानी और नाटक विधा में भी हिन्दी साहित्य के युग-प्रवर्तक रचनाकार थे। उनकी रचना 'कामायनी' को आधुनिक महाकाव्य कहा जाता प्राप्त है। तितली, कंकाल (उपन्यास), चंद्रगुप्त (नाटक) और आकाशदीप (कहानी संग्रह) उनकी प्रमुख रचनाएं हैं।

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8 Tampilan · 28 hari yang lalu

दुनिया का सबसे अनमोल रतन प्रेमचंद की पहली कहानी थी। यह कहानी कानपुर से प्रकाशित होने वाली उर्दू पत्रिकाज़माना में १९०७ में प्रकाशित हुई थी। यह प्रेमचंद के कहानी संग्रह सोज़े वतन में संकलित है।

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4 Tampilan · 28 hari yang lalu

ईदगाह प्रेमचंद की उर्दू में लिखी हुई कहानी है। यह प्रेमचंद की सुप्रसिद्ध कहानियों में एक है। इस में एक अनाथ बालक की कहानी बताई गई है।

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6 Tampilan · 28 hari yang lalu

जैनेंद्र प्रेमचंद-परम्परा के प्रमुख साहित्यकारों में एक प्रसिद्‌ध नाम है। इन्होंने उच्चशिक्षा काशी विश्वविद्‌यालय से प्राप्त की। सन्‌ 1921 ई० में पढ़ाई छोड़कर, गाँधीवादी विचारधारा से प्रभावित होकर असहयोग आंदोलन से जुड़ गए। नागपुर में इन्होंने राजनीतिक पत्रों में संवाददाता के रूप में भी कार्य किया। इनकी प्रथम कहानी ’खेल’ विशाल भारत पत्रिका में प्रकाशित हुई। 1929 में इनका पहला उपन्यास ’परख’ प्रकाशित हुआ जिस पर उन्हें हिन्दुस्तान अकादमी का पुरस्कार भी मिला। जैनेंद्र ने अपनी रचनाओं में पात्रों के चरित्र-चित्रण में सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचय दिया है। जैनेंद्र कुमार की भाषा सहज है, पर जहाँ विचारों की अभिव्यक्ति का मामला आता है, उनकी भाषा गम्भीर हो जाती है। इनकी भाषा में अरबी, फ़ारसी, उर्दू तथा अंग्रेजी भाषा के शब्दों का भी प्रयोग किया गया है।

प्रमुख रचनाएँ - फाँसी, जयसंधि, वातायन, एक रात, दो चिड़ियाँ, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, सुखदा आदि।

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5 Tampilan · 28 hari yang lalu

शब्दों की कारीगरी से एक अद्भुत प्रेम कहानी कहानी बयान करने वाले चंद्रधर शर्मा की कहानी 'उसने कहा था' को 2014 में 100 साल पूरे हो रहे हैं. हिंदी साहित्य में सबसे पुरानी कहानी माने जाने वाली 'उसने कहा था' के संवाद आज भी दिलो-दिमाग पर छाए रहते हैं. यहां पढ़िए 1915 में चंद्रधर शर्मा गुलेरी की लिखी कहानी उसने कहा था.

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4 Tampilan · 29 hari yang lalu

राधिकारमण प्रसाद सिंह (अंग्रेज़ी: Radhikaraman Prasad Singh, जन्म- 10 सितम्बर, 1890, शाहाबाद, बिहार; मृत्यु- 24 मार्च, 1971) का हिंदी के आधुनिक गद्यकारों में प्रमुख स्थान है। उन्होंने कहानी, गद्य, काव्य, उपन्यास, संस्मरण,नाटक सभी विद्याओं में साहित्य की रचना की। उनका संबंध देश के अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थाओं से रहा। राधिकारमण प्रसाद सिंह की गणना हिंदी के यशस्वी-कथाकारों एवं विशिष्ट शैलीकारों में होती है। उन्होंनेलगभग 50 वर्षों तक हिंदी की सेवा की। आधुनिक हिंदी कथा साहित्य में आपका स्थान 'कानों में कंगना' के लिए स्मरणीय है।

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4 Tampilan · 29 hari yang lalu

कृष्ण चंदर हिन्दी और उर्दू के कहानीकार थे। उन्हें साहित्य एवं शिक्षा क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन 1961 में पद्‌म भूषण से सम्मानित किया गया था। उन्होने मुख्यतः उर्दू में लिखा किन्तु भारत की स्वतंत्रता के बाद हिन्दी में लिखना शुरू कर दिया। इन्होंने कई कहानियाँ, उपन्यास और रेडियो व फ़िल्मी नाटक लिखे।
कृष्ण चंदर ने अपनी रचनाओं में सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्यात्मक प्रहार किया। उनकी कहानियां अक्सर मुहावरेदार और सजीव होती थी। उसमें व्यंग्य, विनोद और विचारों का समावेश भी उतना ही होता था।

कृष्‍ण चंदर का जन्‍म 23 नवंबर 1914 को (आज के) पाकिस्‍तान के वजीराबाद में हुआ था और उनका देहांत 8 मार्च 1977 को मुंबई में हुआ। उन्‍होंने 20 उपन्‍यास, 30 कहानी संकलन और दर्जनों रेडियो नाटक लिखे।

आज प्रस्तुत, उनकी कहानी ‘जामुन का पेड़’ एक हास्य व्यंग रचना है जिसमें उन्होंने सरकारी महकमे और उनकी कार्यशैली पर करारा व्यंग किया है!
‘जामुन का पेड़’ नामक इस कहानी को लिखे जाने का ठीक ठीक समय तो ज्ञात नहीं हो सका, लेकिन यदि यह उनके निधन के दस साल पहले भी लिखी गई होगी, तो इस कहानी की उम्र करीब 50 साल बैठती है। जरा सोचिए कृष्‍ण चंदर ने 50 साल पहले जिस लालफीताशाही को इस कहानी में बयां किया है, क्‍या वह आज भी वैसी की वैसी नहीं है?

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2 Tampilan · 29 hari yang lalu

राजेन्द्र बाला घोष हिंदी-नवजागरण की पहली छापामार लेखिका थीं। उन्होंने अपने आक्रामक लेखन द्वारा पुरुष-सत्तात्मक समाज की चूलें ढीली कर दीं। वे छद्माचार्यों द्वारा आरोपित चारित्रिक लांछनों से न टूटीं और न घबराईं बल्कि नये तेवर के साथ नारी-मुक्ति की लड़ाई जारी रखी। नतीजतन-स्त्री-स्वतंत्रता की बहाली के लिए उनका लेखकीय अभियान फेमिनिस्ट आन्दोलन का प्रथम अध्याय साबित हुआ। वे ' बंग महिला ' के छद्मनाम से लिखतीं थीं।

नारियों को रूढ़ तथा जड़ परम्पराओं के शिकंजे में कसने वाली शास्त्रीय व्यवस्थाओ को नकारती हुई बंग महिला ने स्त्री-शिक्षा का नया माहौल बनाया। उन्होंने नारियों के लिए स्वेच्छया पति का चुनाव करने, तलाक देने और यहाँ तक कि ‘पत्यन्तर’ करने के अधिकार की माँगें पुरजोर कीं। उनके लेखन में नया युग नई करवटें लेने लगा।

नि:सन्देह कहा जा सकता है कि बंग महिला के जीवन और कृतित्व में समकालीन नारी-लेखन के तमाम-तमाम मुद्दे अन्तर्भूत हैं।

बंग महिला हिंदी-कहानी लेखन की विचारधारा-सम्पन्न आदि महिला हैं। उन्हीं की बनाई जमीन पर प्रेमचन्द जैसे कहानीकार खड़े हुए। हिंदी कहानियों के लिए नया वस्तु-विधान करने, रचना-प्रक्रिया को अभिनव मोड़ देने और भाषा को समूची प्राण-सत्ता के सा‍थ संचलित करने में बंग महिला का कोई जोड़ नहीं।

बंग महिला हिंदी के पुरोधा समीक्षकों की लामबंदी का शिकार हो गई थीं। एक अदना, विधवा बंगाली स्त्री पुरुष-लेखकों का सरताज नहीं हो सकती थी। उन्हें आठ-नौ दशकों तक गुमनाम कर दिया गया।

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4 Tampilan · 29 hari yang lalu

राजेन्द्र बाला घोष हिंदी-नवजागरण की पहली छापामार लेखिका थीं। उन्होंने अपने आक्रामक लेखन द्वारा पुरुष-सत्तात्मक समाज की चूलें ढीली कर दीं। वे छद्माचार्यों द्वारा आरोपित चारित्रिक लांछनों से न टूटीं और न घबराईं बल्कि नये तेवर के साथ नारी-मुक्ति की लड़ाई जारी रखी। नतीजतन-स्त्री-स्वतंत्रता की बहाली के लिए उनका लेखकीय अभियान फेमिनिस्ट आन्दोलन का प्रथम अध्याय साबित हुआ। वे ' बंग महिला ' के छद्मनाम से लिखतीं थीं।

नारियों को रूढ़ तथा जड़ परम्पराओं के शिकंजे में कसने वाली शास्त्रीय व्यवस्थाओ को नकारती हुई बंग महिला ने स्त्री-शिक्षा का नया माहौल बनाया। उन्होंने नारियों के लिए स्वेच्छया पति का चुनाव करने, तलाक देने और यहाँ तक कि ‘पत्यन्तर’ करने के अधिकार की माँगें पुरजोर कीं। उनके लेखन में नया युग नई करवटें लेने लगा।

नि:सन्देह कहा जा सकता है कि बंग महिला के जीवन और कृतित्व में समकालीन नारी-लेखन के तमाम-तमाम मुद्दे अन्तर्भूत हैं।

बंग महिला हिंदी-कहानी लेखन की विचारधारा-सम्पन्न आदि महिला हैं। उन्हीं की बनाई जमीन पर प्रेमचन्द जैसे कहानीकार खड़े हुए। हिंदी कहानियों के लिए नया वस्तु-विधान करने, रचना-प्रक्रिया को अभिनव मोड़ देने और भाषा को समूची प्राण-सत्ता के सा‍थ संचलित करने में बंग महिला का कोई जोड़ नहीं।

बंग महिला हिंदी के पुरोधा समीक्षकों की लामबंदी का शिकार हो गई थीं। एक अदना, विधवा बंगाली स्त्री पुरुष-लेखकों का सरताज नहीं हो सकती थी। उन्हें आठ-नौ दशकों तक गुमनाम कर दिया गया।

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