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— Team ApnaTube
Unterhaltung
4×4 Thar
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अमीर_बहू_गरीब_ससुराल___Saas_Bahu___Hindi_Kahani___Moral_Stories___Bedtime_Stories___Hindi_Stories(72
इस भावुक कहानी में दिखाया गया है “अमीर बहू – गरीब ससुराल” का सच।
जब एक अमीर घर की लड़की की शादी गरीब परिवार में होती है, तो उसकी ज़िंदगी कैसे बदल जाती है?
क्या प्यार पैसे से बड़ा होता है या हालात रिश्तों को बदल देते हैं?
यह कहानी आपको सिखाएगी: ✅ रिश्तों की असली कीमत
✅ गरीब और अमीर का फर्क
✅ ससुराल की सच्चाई
✅ जीवन का कड़वा सच
अगर आपको भावनात्मक, सामाजिक और सीख देने वाली कहानियाँ पसंद हैं, तो यह वीडियो ज़रूर देखें।
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जब स्वयं श्रीकृष्ण बने अपने ही वंश के विनाश के कारण |Mahabharat-6 MausalParva Ch:1 Bhag-1#mahabharat
"मित्रो!
आज मैं आपके लिए महाभारत का वह अनछुआ अंश लेकर आया हूँ, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था।
भगवान श्रीकृष्ण ने कौरवों और असंख्य दुष्टों का अंत कर धर्म की स्थापना कर दी थी।
युधिष्ठिर महाराज ने अश्वमेध यज्ञ किया, जो राज्य अब तक अजेय थे, वे भी पराजित हो गए।
भारतवर्ष चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर के शासन में आ चुका था।
भगवान कृष्ण ने पृथ्वी का भार उतारने के लिए अवतार लिया था—और युद्ध के बाद यह कार्य पूरा भी हो गया।
लेकिन… क्या आप जानते हैं कि महाभारत का अन्त युद्धभूमि पर नहीं हुआ?
जब धर्म की स्थापना हो चुकी थी, पृथ्वी का भार उतर चुका था, युधिष्ठिर चक्रवर्ती बन चुके थे…
तब श्रीकृष्ण ने देखा—एक बहुत बड़ा बोझ अब भी शेष है।
यह बोझ था यदुवंश।
द्वापर का युग समाप्ति की ओर बढ़ रहा था और कलियुग का प्रवेश होने वाला था।
भगवान कृष्ण ने सोचा—
सात्यकि, कृतवर्मा, अनिरुद्ध, सांब जैसे पराक्रमी वीर यदि जीवित रह गए…
तो आने वाले कलियुग के लिए यह मानवता पर भारी पड़ सकता है।
क्योंकि कलियुग में मनुष्य की बुद्धि भ्रष्ट होगी, धर्म का लोप होगा…
और यदि अपार शक्ति समय के साथ क्षीण न हुई, तो यह सम्पूर्ण जगत के लिए विनाशकारी होगा।
यही सोचकर भगवान कृष्ण ने निश्चय किया कि—
पृथ्वी त्यागने से पहले वे यदुवंश का नाश अवश्य करेंगे।
लेकिन… प्रश्न यह है कि कैसे?
क्या उपाय किया भगवान ने?
यह अभी मैं आपको नहीं बताऊँगा…
जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ेगी, आप स्वयं जान पाएँगे।
मित्रो! यह कथा है यदुवंश के विनाश की —
महाभारत के मौसलपर्व से लिया गया प्रसंग।
यह कथा आठ अध्यायों में विस्तृत है, इसलिए मैं इसे आपके सामने आठ भागों में प्रस्तुत करूँगा।
उम्मीद है कि यह रहस्यमयी कथा आपको पसंद आएगी और आपको बहुत कुछ सिखाएगी भी।
तो चलिए, आरम्भ करते हैं पहला भाग—
यदुवंश का विनाश | मौसलपर्व – भाग 1।"
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! महाभारत युद्धके पश्चात् जब छत्तीसवाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ तब कौरवनन्दन राजा युधिष्ठिरको कई तरहके अपशकुन दिखायी देने लगे। "मित्रो! आपको यह बताते चलूँ कि भगवान श्रीकृष्ण ने लगभग 125 वर्ष तक इस धराधाम पर रहकर ब्रह्माजी की इच्छा पूरी की—
यानी दुष्टों का संहार और धर्म की स्थापना।
इसका अर्थ यह हुआ कि जब पाण्डव द्यूत-सभा में पराजित हुए थे, उस समय उनकी आयु लगभग 76 वर्ष के आसपास रही होगी।
अब यदि इसमें 13 वर्ष का वनवास जोड़ दें तो संख्या पहुँचती है 89 पर।
यानी महाभारत युद्ध के समय अर्जुन की आयु लगभग 90 वर्ष रही होगी।
अब आप सोच रहे होंगे—
कलियुग में तो 60 वर्ष की आयु में ही लोग वृद्ध हो जाते हैं,
फिर 90 वर्ष का योद्धा युद्धभूमि में कैसे उतरा होगा?
मित्रो, इसका रहस्य युगधर्म में छिपा है।
हर युग का अपना धर्म, अपनी व्यवस्था और अपनी आयु सीमा होती है।
यह अनुमान मैं आप पर छोड़ता हूँ।
आप ही सोचिए… कितने शताब्दियों के बराबर उनके जीवन का विस्तार रहा होगा।
चलिए मित्रो, अब कथा में वापस लौटते हैं…"
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय!
बिजलीकी गड़गड़ाहटके साथ बालू और कंकड़ बरसानेवाली प्रचण्ड आँधी चलने लगी। पक्षी दाहिनी ओर मण्डल बनाकर उड़ते दिखायी देने लगे।
बड़ी-बड़ी नदियाँ बालूके भीतर छिपकर बहने लगीं। दिशाएँ कुहरेसे आच्छादित हो गयीं। आकाशसे पृथ्वीपर अंगार बरसानेवाली उल्काएँ गिरने लगीं।
सूर्यमण्डल धूलसे आच्छन्न हो गया था। उदयकालमें सूर्य तेजोहीन प्रतीत होते थे और उनका मण्डल प्रतिदिन अनेक बिना सिरके धड़ों से युक्त दिखायी देता था।
चन्द्रमा और सूर्य दोनोंके चारों ओर भयानक घेरे दृष्टिगोचर होते थे। उन घेरोंमें तीन रंग प्रतीत होते थे। उनका किनारेका भाग काला एवं रूखा होता था। बीचमें भस्मके समान धूसर रंग दीखता था और भीतरी किनारेकी कान्ति अरुणवर्णकी दृष्टिगोचर होती थी।
राजन्! ये तथा और भी बहुत-से भयसूचक उत्पात दिखायी देने लगे, जो हृदयको उद्विग्न कर देनेवाले थे। मित्रो, इन भयंकर अपशकुनों से यह स्पष्ट हो गया कि प्रकृति स्वयं आने वाले अनर्थ की सूचना दे रही थी। आकाश, दिशाएँ, सूर्य-चन्द्रमा और नदियों तक का असामान्य व्यवहार यही संकेत करता था कि अब एक महान वंश का अंत निकट है और समय का चक्र अपना कठोर निर्णय सुनाने वाला है। कथा में वापस आते है
।
इसके थोड़े ही दिनों बाद कुरुराज युधिष्ठिरने यह समाचार सुना कि मूसलको निमित्त बनाकर आपसमें महान् युद्ध हुआ है; जिसमें समस्त वृष्णिवंशियोंका संहार हो गया। केवल भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी ही उस विनाशसे बचे हुए हैं। यह सब सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने समस्त भाइयोंको बुलाया और पूछा - 'अब हमें क्या करना चाहिये?'
ब्राह्मणोंके शापके बलसे विवश हो आपसमें लड़-भिड़कर सारे वृष्णिवंशी विनष्ट हो गये। यह बात सुनकर पाण्डवोंको बड़ी वेदना हुई।
इस मौसलकाण्डकी बातको लेकर सारे पाण्डव दुःख-शोकमें विषाद छा गया और वे हताश हो मन मारकर बैठ गये। मित्रो !
यदुवंश के नाश की यह घटना सुनकर युधिष्ठिर गहरे दुःख में डूब गए। मूसल के शाप ने अपना असर दिखाया और शक्तिशाली वृष्णि-वीर आपस में ही लड़कर नष्ट हो गए। सोचो, जो वीर कुरुक्षेत्र में अपराजित रहे, वही अपने ही भाई-बन्धुओं के हाथों समाप्त हो गए—यह नियति की विडम्बना थी।
युधिष्ठिर ने जब सुना कि कृष्ण और बलराम को छोड़कर समस्त यादव वंश नष्ट हो चुका है, तो पाण्डवों के हृदय पर भारी आघात पहुँचा। वे असहाय और विषाद से भरे हुए सोचने लगे कि अब आगे क्या करना चाहिए।
मित्र, यही तो इस कथा का गूढ़ संदेश है—जब समय का चक्र घूमता है तो सबसे शक्तिशाली कुल भी अपने ही कर्म और नियति के हाथों मिट जाते हैं।" कथा में वापस आते है
।
जनमेजयने पूछा— भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते वृष्णियोंसहित अन्धक तथा महारथी भोजवंशी क्षत्रिय कैसे नष्ट हो गये?
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राधा, सीता और पार्वती — तीनों की माताओं का गुप्त रहस्य | ShivMahapuran ParvatiKhand Ch:2 #shivaparvati #shiv #shiva #shivshankar मित्रो — आज मैं आपके लिए एक अद्भुत, रहस्यमय और अत्यंत दिव्य कथा लेकर आया हूँ, जो सीधे जुड़ी है भगवान शिव, भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण से।
अक्सर आपने सुना होगा — कुछ लोग कहते हैं कि राधारानी का वर्णन कहीं नहीं मिलता, यह केवल एक लोककथा या दंतकथा हैं। परन्तु, ऐसा बिल्कुल नहीं है!
राधाजी का उल्लेख, उनका स्वरूप, उनकी भक्ति और उनकी महिमा — स्वयं शिवमहापुराण में विस्तारपूर्वक वर्णित है।
तो आइए, श्रद्धा और प्रेम के साथ, इस अद्भुत कथा का आरंभ करते हैं… मित्रो,
यह है “मेना, धन्या और कलावती” तीन दिव्य कन्याओं की कथा — जो शिव पुराण (रुद्र संहिता – पार्वती खंड के दूसरे अध्याय ) में वर्णित है।
आज हम जानेंगे एक अत्यंत अद्भुत और दुर्लभ कथा — तीन दिव्य बहनों की कहानी, जिनका संबंध स्वयं देवी पार्वती, माता सीता और राधा रानी से जुड़ा हुआ है।
ये हैं — मेना, धन्या और कलावती।
आइए, शुरू करते हैं यह रहस्यमयी कथा, जो शिवपुराण में वर्णित है।
एक समय की बात है —
प्रजापति दक्ष की अनेक कन्याएँ थीं। उन्हीं में से एक कन्या थीं स्वधा, जिन्हें उनके पिता ने पितरों को दान में दे दिया था।
स्वधा बड़ी पतिव्रता और धर्मनिष्ठा थीं। पितरों की सेवा में सदैव लगी रहतीं।
उनकी भक्ति और तप से प्रसन्न होकर पितरों ने उन्हें आशीर्वाद दिया —
“हे स्वधा! तुम्हारे तप और सेवा से हम अत्यंत प्रसन्न हैं। तुम्हें तीन दिव्य पुत्रियाँ प्राप्त होंगी, जो देवियों के समान तेजस्विनी होंगी।”
और तभी स्वधा से तीन अद्भुत कन्याएँ उत्पन्न हुईं —
मेना, धन्या, और कलावती।
ये तीनों कन्याएँ किसी साधारण माता-पिता की संतान नहीं थीं — ये मनस-पुत्रियाँ थीं, अर्थात् योगबल और दिव्य संकल्प से उत्पन्न हुई थी ।
तीनों में अद्भुत सौंदर्य, तेज और आध्यात्मिक शक्ति थी।
समय बीता।
तीनों बहनों को एक दिन यह इच्छा हुई कि वे श्वेतद्वीप जाएँ — वह स्थान जहाँ भगवान विष्णु स्वयं अपने शुद्ध स्वरूप में निवास करते हैं।
वे वहाँ पहुँचीं और उन्होंने भगवान विष्णु को प्रणाम किया।
उसी समय वहाँ सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार जैसे ब्रह्मर्षि भी उपस्थित थे — जो सदैव ध्यानमग्न रहते हैं।
सभी देवता और दिव्य स्त्रियाँ उन मुनियों के सम्मान में खड़ी हो गईं,
किन्तु मेना, धन्या और कलावती — किसी अज्ञात कारण से — वहीं बैठी रहीं।
यह अ-सम्मान देखकर मुनियों के मुख पर कठोरता छा गई।
मुनियों ने कहा —
“तुम्हें अहंकार है अपने सौंदर्य और तेज का!
हे कन्याओ! तुम दिव्य लोक में रहकर भी मर्यादा भूल गईं।
अतः अब तुम्हें स्वर्गलोक से पतित होकर पृथ्वी पर मानव रूप में जन्म लेना होगा!”
तीनों बहनें भयभीत होकर मुनियों के चरणों में गिर पड़ीं —
“भगवन्! यदि हमसे कोई भूल हो गई है, तो क्षमा करें। हम तो अनजाने में यह अपराध कर बैठीं।”
तब उन सनकादि मुनियों का हृदय पिघल गया।
उन्होंने कहा —
“हे कन्याओ! यद्यपि हमारा वचन झूठा नहीं हो सकता,
पर हमारा श्राप ही तुम्हारे लिए वरदान बन जाएगा।”
उन्होंने तीनों को आशीर्वाद दिया —
मेना — “तुम पृथ्वी पर हिमवान पर्वतराज की पत्नी बनोगी।
तुम्हारे गर्भ से स्वयं देवी पार्वती का जन्म होगा,
जो शिवशक्ति स्वरूपा होंगी।”
धन्या — “तुम राजा जनक की पत्नी बनोगी,
और तुम्हारे गर्भ से सीता उत्पन्न होंगी — जो स्वयं लक्ष्मी का अवतार होंगी।”
कलावती — “तुम वृषभानु गोप की पत्नी बनोगी,
और तुम्हारी पुत्री होगी राधा रानी,
जो श्रीकृष्ण की हृदयस्वरूपा कहलाएगी।”
तो मित्रो यहाँ हमे राधाजी के माता कलावती का वर्णन मिलता है... आज के बाद यदि कोई राधाजी के बारे में संदेह व्यक्त करे तो शिव महापुराण को कोट कीजिएगा......आगे कथा में .....
समय आने पर तीनों बहनें मानव रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुईं —
मेना ने हिमालयराज हिमवान से विवाह किया और पार्वती की जननी बनीं।
धन्या ने राजा जनक से विवाह किया और सीता माता को जन्म दिया।
कलावती ने वृषभानु गोप से विवाह किया और राधा रानी की जननी बनीं।
इस प्रकार तीनों दिव्य बहनों ने तीनों युगों में तीन स्वरूपों में —
शक्ति, भक्ति और प्रेम के स्तंभों को स्थिर किया।
मित्रो,
यह कथा केवल तीन स्त्रियों की नहीं, बल्कि तीन आदर्शों की कथा है —
मेना – तप और शक्ति की प्रतीक।
धन्या – त्याग और मर्यादा की प्रतीक।
कलावती – प्रेम और माधुर्य की प्रतीक।
शिवपुराण हमें यह सिखाता है कि जब किसी का कर्म और हृदय पवित्र हो,
तो श्राप भी वरदान बन जाता है।
कथा का सार...
स्वधा से तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं — मेना, धन्या, कलावती।
मुनियों के श्राप से वे पृथ्वी पर जन्मीं।
मेना बनीं पार्वती की माता, धन्या बनीं सीता की माता, कलावती बनीं राधा की माता।
तीनों ने क्रमशः शक्ति, त्याग और प्रेम की परंपरा को पृथ्वी पर स्थिर किया।
मित्रो,
यह थी मेना, धन्या और कलावती की रहस्यमयी कथा —
जहाँ श्राप भी वरदान बन गया, और मातृत्व ने तीनों लोकों को दिव्यता से भर दिया।
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जय माँ पार्वती!
जय शिव शंकर!
🔱 हर हर महादेव!
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जेब्रा अपना बच्चा को ठंड से बचाया 😓
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श्याम बाबा का अधूरा वचन” एक ऐसी दिव्य और भावुक कथा है
जो भक्ति, विश्वास और चमत्कार—
तीनों का संगम है।
यह कहानी बताती है कि सच्चा प्रेम और प्रार्थना
भगवान को भी चलकर अपने भक्त तक ले आती है।
राजस्थान के गाँव में रहने वाला एक बुजुर्ग पिता हरिराम,
रोज़ खाटू श्याम बाबा को फूल चढ़ाकर
अपने बेटे वीरू की सुरक्षा की दुआ करता था।
जीवन सादा था, परेशानी थी,
लेकिन उसका विश्वास कभी नहीं टूटा।
एक दिन भयानक हादसा हुआ—
पुलिसवाला घर आया और बोला कि
हरिराम का बेटा शहर में हुए एक्सीडेंट में गंभीर रूप से घायल हो गया है।
पिता की दुनिया बिखर गई।
हाथ काँपने लगे, पैर लड़खड़ा गए—
और वह रोते-रोते सड़क पर बैठ गया।
लेकिन विश्वास अभी भी जिंदा था।
वह बेटे को अस्पताल ले गया और ICU के बाहर बैठकर
श्याम बाबा से कहने लगा—
“बाबा… मैं तो रोज़ आपको फूल चढ़ाता था…
क्या मेरा वचन आज अधूरा रह जाएगा?”
रात के 2 बजे ICU का दरवाज़ा अपने आप खुला।
कोई आवाज़ नहीं…
पर कमरे में अचानक दिव्य सुनहरी रोशनी फैलने लगी।
मशीनों की बीप बदल गई।
और ऐसा लगा जैसे किसी ने पिता के कंधे पर हाथ रखकर कहा—
“मैंने तेरे फूल कभी व्यर्थ नहीं जाने दिए…
तेरा वचन अधूरा कैसे छोड़ सकता हूँ?”
सुबह होते ही डॉक्टर हैरान थे—
लड़का पूरी तरह होश में था।
उसने बताया कि रात को एक तेजस्वी रूप वाला युवक आया था
और बोला—
“तेरे पिता की भक्ति ने मुझे यहाँ बुलाया है।”
हरिराम समझ गया—
यह कोई इंसान नहीं था…
स्वयं खाटू श्याम बाबा आए थे।
यह कहानी इस सत्य की मिसाल है कि—
✨ भक्ति का फल देर से मिलता है, पर कभी अधूरा नहीं मिलता।
✨ बाबा अपने भक्त की पुकार जरूर सुनते हैं।
✨ जहाँ मन टूटता है… वहीँ से श्याम की कृपा शुरू होती है।
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और हाँ—
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हमेशा आप तक पहुँचती रहें।
🌸 जय श्री श्याम।
🌸 श्याम बाबा आपका हर वचन पूरा करें।