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Naseeb Hindi Full Movie _ नसीब 1997 _ Govinda_ Mamta Kulkarni_ Kader Khan_ Rahul Roy_ Shakti Kapoor(
Govinda's movie Naseeb (1998, sometimes cited as 1997) is a romantic drama where he plays a sincere, ambitious man betrayed in love and life, ultimately returning as a wealthy industrialist to confront his past. It is noted as one of his significant dramatic performances, a departure from his more famous comedic roles.
Plot Summary
Govinda's character, Krishna Prasad, starts as a humble car mechanic in love with Pooja (Mamta Kulkarni). Pooja's wealthy father rejects Krishna due to his poverty. Krishna leaves to make his fortune, promising to return. He becomes a successful and rich industrialist but, during his long absence, Pooja is married to another man, Deepak (Rahul Roy).
Upon his return, a heartbroken Krishna struggles with his unfulfilled love and plots vengeance against Pooja and Deepak, which leads to emotional conflicts and dramatic confrontations. The story culminates in a tragic climax where Krishna, realizing the depth of Pooja's love for her husband, commits suicide.
Key Aspects
Genre: Romantic Drama, featuring high emotion and family conflict, with little to no comedy.
Performance: Govinda's serious and intense acting was well-received by critics and audiences, with some considering it one of his finest dramatic performances.
Music: The film's soundtrack by Nadeem-Shravan was a major highlight, with songs like "Shikwa Nahin Kisi Se" and "Churaa Lenge Hum Sabke Saamne Dil Tera" becoming popular hits.
The movie is distinct from the 1981 multi-starrer film of the same name, which featured Amitabh Bachchan and was a different genre (masala action).
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राक्षस और राजकुमार – पूरी कहानी (Full Story)
बहुत समय पहले अवंतिका राज्य में एक बहादुर राजकुमार आरव रहता था। राज्य में सब कुछ शांत था, लेकिन एक समस्या थी—
पास के जंगल में एक भयानक राक्षस रहता था, जो रात होते ही लोगों को डराता और उनकी चीज़ें लूट लेता।
एक दिन राजकुमार ने निर्णय लिया—
“अब बहुत हुआ, मैं इस राक्षस से खुद बात करूँगा।”
राजा ने मना किया, पर राजकुमार अडिग था।
वह घोड़े पर सवार होकर जंगल पहुँचा।
जैसे ही वह गुफा के पास पहुँचा, राक्षस गरजा,
“कौन है जो मेरी नींद खराब करने आया है?”
राजकुमार साहस से बोला,
“मैं आरव हूँ। अगर तुम लोगों को परेशान करना बंद कर दो, तो मैं तुम्हें भी सम्मान से जीने दूँगा।”
राक्षस चौंका—
“कोई मुझसे बातें करने की हिम्मत नहीं करता… तुम क्यों कर रहे हो?”
राजकुमार बोला,
“क्योंकि हर बुरे के पीछे एक वजह होती है। बताओ तुम इतने गुस्से में क्यों रहते हो?”
राक्षस की आँखें भर आईं,
“मैं पहले एक इंसान था। लोगों ने मुझे धोखा दिया, इसलिए मैं जंगल में अकेला रहने लगा। गुस्सा बस आदत बन गया…”
राजकुमार मुस्कुराया,
“तो आदत बदलो। मैं तुम्हें मौका देता हूँ—राज्य की रक्षा करो, लोगों की मदद करो। तुम मेरे सैनिकों में शामिल हो सकते हो।”
राक्षस ने पहली बार दहाड़ नहीं लगाई—बल्कि सिर झुका दिया।
“अगर तुम मुझ पर भरोसा करते हो, मैं बदलने को तैयार हूँ।”
राजकुमार उसे महल ले गया।
धीरे-धीरे लोग राक्षस को डरने की बजाय सम्मान देने लगे।
अब वही राक्षस, जो कभी खतरा था, राज्य का सबसे भरोसेमंद रक्षक बन गया।
राजा ने घोषणा की—
“सच्चा योद्धा वही है जो तलवार से नहीं, दिल से जीतता है।”
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सीख (Moral of the Story)
हर बुराई के पीछे कोई छिपी कहानी होती है।
दया और समझदारी से बड़ा कोई हथियार नहीं।
इंसान बदल सकता है, अगर उसे मौका दिया जाए।
बिल भिजवा देता है – मजेदार हास्य कहानी
शहर में गोपाल नाम का आदमी था, जो हर जगह जाता था लेकिन कभी खुद पैसे नहीं देता था।
उसकी एक ही ट्रिक—
“मैं तो बाद में बिल भिजवा देता हूँ!”
एक दिन वह अपने दोस्त राकेश के साथ होटल गया।
गोलगप्पे, चाट, दो प्लेट छोले-भटूरे… सब खत्म होने के बाद वेटर आया।
राकेश बोला,
“गोपाला, आज तू पैसे देगा!”
गोपाला हँसकर बोला,
“अरे पैसे क्यों दूँ? मैं बिल भिजवा देता हूँ।”
राकेश ने माथा पकड़ लिया,
“किसको भिजवाएगा? घरवालों को?”
गोपाला बोला,
“नहीं रे… खाने की दुकान वाले को!”
वेटर हैरान,
“बाबूजी, हम ही तो होटल वाले हैं! बिल हमें ही देना है!”
गोपाला अकड़कर बोला,
“तो भिजवा दूँगा ना! तुम एक बार बिल भेजकर देखो… मैं भी भेज दूँगा वापस!”
वेटर गुस्से में बोला,
“क्या मतलब?”
गोपाला बोला,
“सीधी बात है—तुम बिल भेजोगे, मैं व्हाट्सऐप पर ‘Seen’ करके छोड़ दूँगा!”
यह सुनते ही पूरा होटल हँसी से गूंज उठा।
वेटर ने कहा,
“बाबूजी, ये होटल है, व्हाट्सऐप ग्रुप नहीं!”
आखिर में राकेश ने मजबूरी में पैसे दिए और जाते-जाते कहा—
“गोपाला, तू बहुत बड़ा कलाकार है।”
गोपाल मुस्कुराया—
“कलाकार नहीं भाई… बिल-कारक हूँ! जो भी बिल आता है, वापस भिजवा देता हूँ!”
एक दिन सुबह-सुबह मोहन की पत्नी सविता ने बड़ी मासूमियत से पूछा—
“सुनते हो, अगर मेरी एक ख्वाहिश पूरी कर दो तो मैं उम्र भर खुश रहूँगी!”
मोहन थोड़े डर गए, सोचने लगे—
कहीं फिर से कोई महंगा फोन या विदेश यात्रा की बात न कर दे…
मोहन ने हिम्मत जुटाकर पूछा,
“ठीक है, बोलो क्या ख्वाहिश है?”
सविता बोली,
“मेरी बस एक छोटी-सी इच्छा है… मुझे ऐसा पति चाहिए जो मुझे रोज़-रोज़ गाड़ी से घूमाए, फूल लाकर दे, और मेरी हर बात माने।”
मोहन मुस्कुराया और बोला,
“तो फिर मुझे भी एक छोटी-सी ख्वाहिश पूरी करनी होगी…”
सविता बोली, “वो क्या?”
मोहन बोला,
“बस तुम बता दो कि ये सब करने वाला पति पड़ोस वाली कल्पना दीदी कहाँ से लाती हैं, मैं भी वहीं से ले आता हूँ!”
सविता गुस्से में बोली:
“अच्छा! आज मेरी ख्वाहिश तो रह गई, पर तुम्हारी आज ‘ख्वाइश’ पूरी कर दूँ? खाना बनाते हुए बेलन भी चलाऊँ क्या?”
मोहन तुरंत बोले—
“नहीं-नहीं, रहने दो। मैं ही रोज़ गाड़ी भी चलाऊँगा, फूल भी लाऊँगा… बस बेलन नीचे रख दो!”
और इस तरह मोहन ने सीख ली—
पत्नी की ख्वाहिश पूरी करो, वरना उसकी ‘ख्वाइश’ नहीं… उसकी ‘क्वाइशें’ पूरी कर देंगी!
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सीख (Moral)
पत्नी की ख्वाहिशें नज़रअंदाज़ करना खतरनाक हो सकता है।
हर मज़ाक सोच-समझकर करना चाहिए।
खुशहाल जीवन के लिए थोड़ा समझौता ज़रूरी है।
मजेदार हास्य कहानी
एक छोटे से कस्बे में रमेश नाम का आदमी रहता था। वह हमेशा दूसरों की तारीफ़ करने में पीछे नहीं हटता था। उसकी आदत थी कि वह किसी की भी, कभी भी, कहीं भी तारीफ़ कर देता—चाहे जिस बात की ज़रूरत हो या नहीं।
एक दिन रमेश की मुलाकात उसके पड़ोसी शyamlal से हुई। शyamlal ने नए कपड़े सिलवाए थे, पर सिलाई कुछ अजीब थी—कॉलर टेढ़ा, बटन उल्टा और फिटिंग ढीली।
रमेश ने अपनी आदत के अनुसार तुरंत बोल दिया,
“वाह शyamlal जी! क्या शर्ट है! बिल्कुल फिल्मी हीरो लग रहे हो!”
शyamlal फूलकर कुप्पा हो गया।
वह उसी उत्साह में दर्जी के पास पहुँचा और बोला,
“देखो, मेरी शर्ट पर सब मेरी तारीफ़ कर रहे हैं!”
दर्जी ने देखा और हँसकर बोला,
“ये शर्ट तो खराब सिल गई है, तारीफ़ किसने की?”
शyamlal ने गर्व से कहा, “रमेश ने!”
दर्जी भड़क गया, “तो इसका मतलब मैंने गलत सिलाई की और रमेश ने मज़ाक उड़ाया! मैं जरूरत तुम्हें नई शर्ट मुफ़्त में दूँगा!”
लेकिन साथ ही उसने कहा, “पहले रमेश को लेकर आओ, मुझे भी सुनना है उसने क्या तारीफ़ की थी!”
अब शyamlal ने रमेश को पकड़ लिया।
“चलो मेरे साथ! तुम्हारी ही वजह से मैं फँस गया हूँ।”
दर्जी ने रमेश से पूछा,
“तुमने मेरी सिलाई की तारीफ़ क्यों की?”
रमेश डर गया और बोला,
“मैं तो बस आदत से मजबूर हूँ… मैं तो हर चीज़ की तारीफ़ कर देता हूँ!”
दर्जी ने गुस्से में कहा,
“तो भाई, ज़रूरत से ज्यादा तारीफ़ करोगे तो नुकसान तो होगा ही!”
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई—घर लौटकर शyamlal ने रमेश को कहा,
“आज से मेरी किसी चीज़ की तारीफ़ मत करना! नहीं तो इस बार शर्ट नहीं, मेरी बीवी मुझे कसेगी!”
अब रमेश सीख गया—तारीफ़ भी सोच-समझकर करनी चाहिए, नहीं तो वाकई… ‘तारीफ़ भी पड़ जाती है महंगी!’
एक घने जंगल में एक शेर रहता था जो अपनी ताकत के घमंड में किसी को भी तंग कर देता था। सभी जानवर उससे डरते थे, लेकिन एक बंदर था जो बहुत चतुर और फुर्तीला था।
एक दिन शेर गुस्से में गरजा,
“जंगल में मेरी ही चलती है! जो भी मुझे चुनौती देगा, मैं उसे सबक सिखा दूँगा!”
बंदर ने हँसते हुए कहा,
“शेर भैया, ताकत तो आपके पास है, लेकिन दिमाग भी कोई चीज़ होती है।”
शेर यह सुनकर नाराज़ हो गया और बोला,
“अगर हिम्मत है तो मेरी ताकत से बचकर दिखाओ!”
बंदर तुरंत एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया और शेर उसे पकड़ न पाया।
फिर बंदर ने कहा,
“शेर भाई, आप अपनी ताकत पर भरोसा करते हैं, लेकिन दिमाग से ही मुश्किलों से निकला जाता है।”
शेर बार-बार पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करता रहा, लेकिन असफल रहा। अंत में वह थककर नीचे बैठ गया।
बंदर नीचे उतरा और बोला,
“गुस्सा और घमंड किसी का भला नहीं करते। जो दूसरों को तंग करेगा, उसे ही मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।”
शेर को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने बाकी जानवरों से अच्छा बर्ताव करने का वादा किया।
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